Saturday, September 13, 2025

हिंदी दिवस

 भारत में हर वर्ष 14 सितम्बर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता हैै। 14 सितम्बर से 28 सितंबर तक हिंदी पखवाड़ा। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए हमारे देश के कुछ पुरोधाओं ने अथक प्रयास किया। उनकी दूर दृष्टि ने राष्ट्रीय एकता में भाषा की शक्ति पहचानी और इस बात पर बल दिया कि कोई एक भाषा हो जो पूरे देश में स्वीकार्य हो। उन्होंने बताया कि हिंदी ही वह भाषा है जो समूचे देश को एक सूत्र में पिरो सकता है। एकता की डोर को मजबूत कर सकती है और इसका प्रयोग बोलचाल, लिखाई पढ़ाई, कार्यलय में काम काज और सरकारी स्तर पर भी होना चाहिए।

आजादी के बाद इसके लिए मुहिम चलाने वालों में व्यौहार राजेंद्र सिंह  के साथ हजारी प्रसाद द्विवेदी, काका कालेलकर, सेठ गोविंद दास,मैथिलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा सरीखे महान साहित्यकार थे।

व्यौहार राजेन्द्र सिंह ने इसमें अहम भूमिका

श्री व्यौहार राजेन्द्र सिंह

निभायी। देशभर में उन्होंने यात्रएं की , प्रचार प्रसार किया। दक्षिण भारत मे अनुकूल माहौल बनाने के लिए इन्होंने बहुत काम किया। हिंदी के विरोध में खड़े लोगों को भी उन्होंने सहमत किया और उनसे आग्रह किया कि हिंदी को राजभाषा बनाया जाए। दक्षिण के राज्यों में उन्होंने इस मसले पर बहुत ही सराहनीय कार्य किया। उनकी भूमिका की इसमें काफी तारीफ हुई। व्यौहार राजेन्द्र सिंह का जन्म 14 सितंबर 1900 को जबलपुर में हुआ था। 02 मार्च 1988 को इनका निधन हो गया। 14 सितंबर 1949 को भारत सरकार ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का विधिवत निर्णय ले लिया। दिल्ली से सबसे पहले ये संदेश सेठ गोविंद दास ने जो जबलपुर के  तत्कालीन सांसद थे , व्यौहार राजेन्द्र सिंह जी को, उनके प्रयासों और चलाये गए पुरजोर मुहिम को देखते हुए  उनके 50 वें जन्मदिन पर उपहारस्वरूप दिया। तभी से  राजभाषा के रूप में उत्तरोत्तर हिंदी की प्रतिष्ठा बढ़ती चली गयी। इस दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। आज विश्व स्तर पर भी हिंदी ने अपनी जगह बना ली है। श्री अटल विहारी वाजपेयी भारत के पहले विदेश मंत्री थे जिन्होने सन्युक्त राष्ट्रसंघ के अधिवेशन में हिंदी में गौरवशाली भाषण दिया।

राजेन्द्र सिंह जी हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी थे। बताया जाता है कि एक बार विदेश में आयोजित सर्वधर्म सम्मेलन में प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने हिंदी में भाषण दिया। हिंदी के अलावे देश की अन्य भाषाओं मराठी, तेलगू, गुजराती, बंगाली, मलयालम, उर्दू इत्यादि पर भी इनकी पकड़ मजबूत थी।वे एक मूर्धन्य विद्वान और महान सहित्यकार थे। राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के लिये  प्रतिबध्द और समर्पित भी। भाषा की महत्ता औऱ पैरोकारी में उन्होंने असाधरण साधना की। देश हमेशा उनको याद रखेगा।