आज मैं एक ऐसे सम्राट के बारे में कुछ रोचक बातें लेकर आया हूँ जो न तो किसी हुकूमत, राज, साम्रज्य की बागडोर का मालिक था और न ही ऐसी कोई व्यवस्था से जिसका नाम जुड़ा हुआ है, बल्कि उस व्यक्ति के असाधारण साहित्य सृजन के कारण उसे हमेशा आदर के साथ याद किया जाता है। हिंदी साहित्य में एक अलग परंपरा की नींव डालने वाले , यथार्थवादी और प्रगतिशील लेखकों में जिनका नाम सबसे ऊपर शुमार होता है, जिन्हें कलम का सिपाही और उपन्यास सम्राट ' मुंशी प्रेमचंद 'के नाम से साहित्य जगत के लोग पुकारते हैं।
मुंशी प्रेमचंद अपने अनमोल उपन्यासों की रचनाओं और लेखनी की शक्तियों के कारण उपन्यास सम्राट थे । एक अभिभावक की तरह उन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया तथा लेखन की परंपरा में एक ऐसा अनुशासन स्थापित किया जिसके कारण साहित्य की धारा सामाजिक संघर्ष और हितों की ओर उन्मुख हुई। परंतु उनका व्यक्तिगत जीवन निर्धनता , संघर्ष और उतार- चढ़ाव से भरा हुआ हुआ था। फिर भी ये मुसीबतें उनके साहित्य जीवन में सकारात्मक प्रभाव ही ला पायी, और वे आजीवन लिखते रहे, कभी रुके नहीं। उनके साहित्य में साधना और परीश्रम स्पष्ट परिलक्षित होता है।
उनका मूल नाम धनपतराय श्रीवास्तव था। 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के समीप अवस्थित लमही नामक गाँव में उनका जन्म हुआ था।
इनकी माता का नाम आनंदी देवी तथा पिता का नाम मुंशी अजायबराय था।उन्हें ' नवाब ' उपनाम से भी जाना जाता है। 08 अक्टूबर 1936 को इस सम्राट का देहावसान हुआ। अपने 56 वर्ष के जीवनकाल में अनेक सामाजिक और आर्थिक दंशों का सामना करते हुए भी इन्होंने हिम्मत नहीं हारी तथा अपने जीवन के इस अमूल्य अल्पकाल में ही उन्होंने जिन अनमोल कृतियों की रचना की वे सभी अनोखे और अनमोल हैं तथा भारतीय साहित्य की अनूठी संपदा बन गई हैं।
दो बैलों की कथा , पंचपरमेश्वर, बूढ़ी काकी, बड़े घर की बेटी, पूस की रात, नमक का दरोगा इत्यादि इनकी प्रसिद्ध कहानियां हैं।
रंगभूमि(1924),निर्मला(1927),गबन(1928),गोदान(1936),कफन(1936),मानसरोवर(1936) इत्यादि अमर उपन्यासों व कहानियों की रचना कर हिन्दी साहित्य को इन्होंने समृद्ध किया।
समाज की गरीबी व अंधविस्वास जैसे गहरे अंधकार का चित्रण , उसका पुरजोर विरोध और साहित्य में उन समस्याओं को आवाज देना उनके साहित्यिक आंदोलन का धर्म और कर्म था। वो हमेशा समाज और सत्ता में व्याप्त कुरीतियों एवं निर्दयता , उत्पीड़न, दमन,गरीबी की विभीषिका पर चोट करते रहे। घोर गरीबी तथा भूख व वस्त्रों का अभाव इत्यादि कलंकित करने वाली समस्याओं से जूझता इंसान, फिर भी सामाजिक मान्यताओं पर खड़े उतरने की कोशिश और समाज में रहते समाज द्वारा अनादर व सहयोग वाले दोनों चेहरों का सजीव वर्णन इन्होंने अपने साहित्य में जैसा किया वह अन्यत्र दुर्लभ है।
उनकी रचनाओं का दुनिया की अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हुआ, फिल्में बनी तथा इनके जीवन और कृतियों पर लगातार शोधकर्ताओं ने शोध भी किया है।
मुंशी प्रेमचंद का पहला विवाह 15 साल की आयु में हो गया।कहा जाता है कि पहली पत्नी के साथ इनका दाम्पत्य जीवन असफल रहा। उनकी यह पत्नी उनसे उम्र में बड़ी थीं, कुरूप और संवाद में भी बहुत कटु।प्रेमचन्द काफी परेशान रहते थे।उनकी माता की मृत्य भी बचपन मे ही हो गयी थी। इनके पिताजी ने फिर दूसरी शादी की और इन्हें सौतेली मां का दंश झेलना पड़ा।इसी विमाता के पिता यानी नाना ने उनकी ये शादी कराई थी। परिवार को चलाने में बड़ी आर्थिक मुश्किलों का सामना इन्हें करना पड़ा। एक बार आर्थिक तंगी के कारण बताया जाता है कि इन्होंने पतलून और कोट बेच दिया था।
1926 में बाल विधवा शिवरानी देवी से इनका दूसरा विवाह हुआ। विधवा पुनर्विवाह जैसे सामाजिक सुधारों के ये समर्थक थे और आर्य समाज से इनका लगाव था। दूसरी शादी के उपरांत इन्हें सामाजिक तिरस्कार व विरोध का भी सामना करना पड़ा। लेकिन शिवरानी देवी के जीवन में आते ही थोड़ी ख़ुशहाली, पदोन्नति व नौकरी और आमदनी में इजाफा भी हुआ।इनकी तीन संताने हुई, श्रीपत राय, अमृत राय, कमला देवी।
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| मुंशी प्रेमचंद व उनकी पत्नी शिवरानी देवी।इनके पोशाक तथा बांये पैर की फटे जूते इस तस्वीर में स्पष्ट दिखाई दे रहे जो इनकी सादगी के साथ इनके व्यक्तित्व और जीवन के बारे में संकेत करते हैं। |
1908 में 'सोजे वतन' नामक रचना के लिए , हमीरपुर के कलक्टर के कार्यालय में इन्हें पेश होना पड़ा जहां कड़ी चेतावनी के साथ इनके सभी प्रतियों को आग के हवाले कर जला दिया गया क्योंकि उसमें ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लिखी गयी थी। इसी घटना के बाद इन्होंने मुन्शी प्रेमचंद नाम से लिखना प्रारम्भ किया।
कमल किशोर गोयनका ने इनके बारे में काफी खोज की तथा उनकी निजी जीवन एवं कुछ कमजोरियों का जिक्र किया। पर उनकी रचनाओं की गुणवत्ता तथा हिंदी साहित्य में अमिट योगदान के आगे वे कोई खास महत्व नहीं रखते।
प्रेमचंद ने 1915 से कहानियां तथा 1918 से उपन्यास (सेवासदन) लिखना शुरू किया। हालांकि उनकी उर्दू में 1907 में ही एक रचना प्रकाश में आ गयी थी। बताया जाता है कि लगभग 13 साल की उम्र से ही वो लिखने लगे थे।नियमित रूप से उनका रचनाकार के रूप में जीवन 1901 में ही शुरू हो गया।उनकी पहली हिन्दी कहानी "सौत" 1915 में सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुई । 1936 में उनकी अंतिम कहानी ' कफन' प्रकाशित हुई।'मंगलसूत्र' इनकी अपूर्ण रचना थी जिसके पूरा होने से पहले ही इस महान साहित्यकार का निधन हो गया।
प्रेमचंद की रचनाओं के पात्र प्राय: ग्रामीण पृष्ठभूमि के है। यथार्थ के धरातल पर लिखी हुई इनकी कृतियों में ऐसा लगता है जैसे इनहोंने अपने करीबी समाज के लोगों में से ही पात्रों एवं कथानक का जैसे चयन किया हो।प्रेमचंद की स्मृति में उनके गाँव लमही में एक स्मारक का भी निर्माण किया गया है जहां रहते हुए इन्होंने लेखन किया।
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| मुंशी प्रेमचंद की प्रतिमा |
बारीकी से प्रेमचंद के जीवन के सभी पहलुओं पर प्रकाश डालते है और वहां आनेवाले साहित्यप्रेमियों एवं आगंतुकों को बखूबी बताते हैं। स्मारक में उपन्यास सम्राट से सम्बंधित जीवन के यादगार वाली चीजें , तस्वीरें एवं पुस्तकालय भी है जिसमें उनकी अनमोल कृतियाँ उपलब्ध है।
जीवन के अंतिम काल मे भी आर्थिक तंगी, बीमारी और इलाज के अभाव जैसी समस्यायें रही, फिर भी आजीवन साहस और विनोदप्रिय स्वभाव के कारण समाज के प्रति इनका योगदान कभी बाधित नही हुआ और इनकी साहित्य साधना मृत्युपर्यन्त चलती रही।
मुंशी प्रेमचंद वाक़ई में आज भी उपन्यास सम्राट हैं और हिंदी साहित्याकाश में एक ऐसे सूर्य की तरह स्थापित हैं जिसका प्रकाश कभी धूमिल नहीं होगा।





मुंशी प्रेमचंद की कहानियां और उपन्यास को लेकर हिन्दी साहित्य में अनेक प्रकार की बातें कही गई है, लेकिन सबका निचोड़ रही है कि उनके आगे सब बौने हैं।
ReplyDeleteमुंशी प्रेमचंद की कहानियां और उपन्यास को लेकर हिन्दी साहित्य में अनेक प्रकार की बातें कही गई है, लेकिन सबका निचोड़ यही है कि उनके आगे सब बौने हैं।
ReplyDeleteMunshi Premchand is a great novelist of India and hindi literature. he faced poverty but continued literature.very good article.
ReplyDeleteThough this great novelist was finacially very poor in the early stage of life and morover further in his life time also, but he helped the poor from his limited income and continued writing on poverty, corruption, social backwardness etc. His contribution to the literature was exemplary.
ReplyDeleteमुंशी प्रेचन्द एक यथार्थवादी लेखक थे जिसकी झलक उनकी कहानियों और उपन्यासों में मिलती है।
ReplyDeleteआज साहित्य के प्रेमी, सुधी पाठक, लेखकगण तथा अन्य क्षेत्र के लोग द्वारा इस असाधरण रचनाकार को उनके जन्म दिन पर याद किया जा रहा है।
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